| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 119 |
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| | | | श्लोक 3.200.119  | वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशा:।
भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम्॥ ११९॥ | | | | | | अनुवाद | | वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! मार्कण्डेयजी के ऐसा कहने पर महाबली युधिष्ठिर बोले - 'प्रभो ! अब मैं (दानकी) उत्तम एवं मुख्य विधि सुनना चाहता हूँ ॥119॥ | | | | Vaishampayanji says – Janamejaya! On Markandeyaji saying this, the great Yudhishthir said – 'Lord! Now I (Danaki) want to hear the best and main method. 119॥ | | ✨ ai-generated | | |
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