श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  3.200.117 
इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत्।
तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम्॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
अतः मनुष्य को चाहिए कि इन्द्रियों को शुद्ध करके इन विषय-भोगों का त्याग कर दे। इन्द्रियों की पवित्रता और संयम से होने वाला यह व्रत (विषयों का परित्याग) दिव्य है ॥117॥
 
Therefore, man should give up these sensual pleasures by purifying the senses. This fasting (abstention of objects) that occurs due to purity and restraint of senses is divine. 117॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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