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mahabharat 3.200.116: वेदों में देवताओं की आयु तथा उनके कर्मों के शुभ-अशुभ फल का उल्लेख है। उसी के अनुसार प्रत्येक युग में देहधारियों का प्रभाव संसार में प्रतिबिम्बित होता है ॥116॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  3.200.116 
वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्चैव कर्मणाम्।
फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम्॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
वेदों में देवताओं की आयु तथा उनके कर्मों के शुभ-अशुभ फल का उल्लेख है। उसी के अनुसार प्रत्येक युग में देहधारियों का प्रभाव संसार में प्रतिबिम्बित होता है ॥116॥
 
The age of the gods and the good and bad results of their deeds are mentioned in the Vedas. According to that, the effects of the embodied beings are reflected in the world in every age. ॥ 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)