श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  3.200.114 
शुष्कं तर्कं परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम्।
एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि।
बुद्धिर्न तस्य सिद्धॺेत साधनस्य विपर्ययात्॥ ११४॥
 
 
अनुवाद
यदि तुम उस ईश्वरीय तत्त्व को, जो प्रणव से संबंधित है, तर्कपूर्वक अर्थात् बिना किसी संदेह के समझना चाहते हो, तो केवल बुद्धिवाद को छोड़कर श्रुति और स्मृति के वचनों का आश्रय लो। क्योंकि जो उपर्युक्त साधनों का आश्रय नहीं लेता, उसकी बुद्धि तत्त्व का निश्चय करने में समर्थ नहीं हो सकती ॥114॥
 
If you want to understand the divine essence which is related to Pranava rationally i.e. without any doubt, then leave aside mere rationalism and take shelter of the words of Shruti and Smriti. Because the intellect of one who does not take recourse to the above means cannot be capable of determining the essence. 114॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)