| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 112 |
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| | | | श्लोक 3.200.112  | नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।
ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धा: प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ ११२॥ | | | | | | अनुवाद | | जिसका मन संशय से भरा है, उसके लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख है। 'ज्ञान ही मोक्ष का लक्षण है' - ऐसा वृद्ध और बुद्धिमान पुरुषों का कथन है ॥112॥ | | | | For one whose mind is full of doubts, there is neither this world nor the next world nor happiness. 'Knowledge is the sign of salvation' - this is the saying of old and wise men. ॥ 112॥ | | ✨ ai-generated | | |
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