| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 111 |
|
| | | | श्लोक 3.200.111  | द्वॺक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितै:।
शतैरन्यै: सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ १११॥ | | | | | | अनुवाद | | भगवान् के तत्व का ज्ञान केवल दो अक्षरों 'तत्त्वम्' से अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि से प्राप्त हो सकता है। कोई-कोई सैकड़ों-हजारों श्लोकों में लिखे शास्त्रों से भी भगवान् के स्वरूप को जान लेते हैं। जो भी हो, समझ ही मोक्ष का लक्षण है ॥111॥ | | | | One can get the knowledge of God's essence from just two letters 'Tatvam' or Ram, Krishna, Vishnu, Shiva etc. Some know the nature of God from hundreds and thousands of scriptures written in verses and verses. Be that as it may, understanding is the sign of salvation. 111॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|