| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 110 |
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| | | | श्लोक 3.200.110  | आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम्।
श्लोकेन यदि वार्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम्॥ ११०॥ | | | | | | अनुवाद | | यदि एक या आधे श्लोकसे भी सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें स्थित परमेश्वरका ज्ञान हो जाय तो सम्पूर्ण शास्त्रोंके अध्ययनका प्रयोजन ही नष्ट हो जाता है ॥110॥ | | | | If even by one or half a verse one gets the knowledge of God who resides in the hearts of all the ghosts, then the purpose of studying the entire scriptures is lost. 110॥ | | ✨ ai-generated | | |
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