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mahabharat 3.200.11: राजन! इसलिए मनुष्य को स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से सभी अवस्थाओं में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को ही सब प्रकार का दान देना चाहिए॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.200.11 
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव।
दातव्यानि द्विजातिभ्य: स्वर्गमार्गजिगीषया॥ ११॥
 
 
अनुवाद
राजन! इसलिए मनुष्य को स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से सभी अवस्थाओं में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को ही सब प्रकार का दान देना चाहिए॥11॥
 
Rajan! That is why a man should give all kinds of donations only to the (best) Brahmins in all situations with the desire to attain the path to heaven. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)