श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  3.200.109 
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुडॺोपमानि च।
विनश्यन्ति न संदेह: फेनानीव महार्णवे॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि जब आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तो वह लकड़ी के टुकड़े या दीवार की तरह जड़ हो जाती है और समुद्र में उठते झाग की तरह नष्ट हो जाती है।
 
There is no doubt that when the soul is separated from the body, it becomes inert like a piece of wood or a wall and gets destroyed like the foam rising in the ocean.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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