श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  3.200.108 
बीजानि ह्यग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संयुज्यते पुन:॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
जैसे अग्नि में जलाए गए बीज पुनः अंकुरित नहीं होते, वैसे ही जब ज्ञान द्वारा अज्ञान आदि क्लेश नष्ट हो जाते हैं, तब आत्मा पुनः उनसे संसर्ग नहीं करता ॥108॥
 
Just as seeds burnt in fire do not sprout again, so too when the soul's afflictions such as ignorance etc. are destroyed by knowledge, it does not get associated with them again. ॥108॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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