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mahabharat 3.200.107: तत्त्वज्ञान या शुभ कर्मों से ही रोग, मृत्यु और व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं और उत्तम पद (मुक्ति) प्राप्त होता है ॥107॥   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  3.200.107 
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च।
व्याधयश्च प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम्॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
तत्त्वज्ञान या शुभ कर्मों से ही रोग, मृत्यु और व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं और उत्तम पद (मुक्ति) प्राप्त होता है ॥107॥
 
Only through philosophy or good deeds, diseases, death and diseases are destroyed and the best position (liberation) is attained. 107॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)