| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 103 |
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| | | | श्लोक 3.200.103  | अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत् प्रहीयते।
नाग्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिन:॥ १०३॥ | | | | | | अनुवाद | | शास्त्रविहित नहीं, ऐसे कर्म करने से केवल दुःख ही होता है और उनसे पाप नष्ट नहीं होते। अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म भी भक्तिहीन अर्थात् श्रद्धाहीन मनुष्य के पापों को जला नहीं सकते॥103॥ | | | | Doing such acts which are not prescribed in the scriptures, only brings misery and sins cannot be destroyed by them. Auspicious acts like Agnihotra etc. cannot burn away the sins of a person who is devoid of devotion i.e. without faith.॥103॥ | | ✨ ai-generated | | |
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