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mahabharat 3.200.102: यह सत्य नहीं है कि भोजन आदि त्यागने से पाप शुद्ध हो जाते हैं। हां, भोजन त्यागने से मांस और रक्त से ढका शरीर अवश्य ही दुर्बल हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.200.102 
न हि पापानि कर्माणि शुद्धॺन्त्यनशनादिभि:।
सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपन:॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
यह सत्य नहीं है कि भोजन आदि त्यागने से पाप शुद्ध हो जाते हैं। हां, भोजन त्यागने से मांस और रक्त से ढका शरीर अवश्य ही दुर्बल हो जाता है।
 
It is not true that sins are purified by giving up food etc. Yes, by giving up food the body covered with flesh and blood certainly becomes weak.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)