श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  3.200.101 
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृत:।
यावज्जीवं दयावांश्च सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
जो घर में पवित्र रहता है, उत्तम गुणों से सुशोभित रहता है और जीवन भर सब प्राणियों पर दया करता है, उसे मुनि समझना चाहिए; वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥101॥
 
He who remains pure at home, is adorned with good qualities and is compassionate towards all creatures throughout his life, should be considered a sage; he becomes free from all sins. ॥101॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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