श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 1-2h
 
 
श्लोक  3.200.1-2h 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा स राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तदा।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम्॥ १॥
युधिष्ठिरो महाराज पुन: पप्रच्छ तं मुनिम्।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! राजा युधिष्ठिर ने महर्षि इन्द्रद्युम्न के मुख से महाभाग मार्कण्डेयजी को पुनः स्वर्ग प्राप्ति की कथा सुनकर उन मुनि से पुनः पूछा। 1 1/2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! King Yudhishthir, after hearing the story of Mahabhag Markandeyaji attaining heaven again from the mouth of sage Indradyumna, again asked that sage. 1 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)