Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.20.2: महाराज! जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मैंने देखा कि द्वारका निर्जन हो रही है। वहाँ न तो स्वाध्याय हो रहा है, न ही वषट्कार हो रहा है। वह आभूषणों से रहित सुन्दरी के समान उदास लग रही थी॥ 2॥ | mahabharat अध्याय 3.20: श्रीकृष्ण और शाल्वका भीषण युद्ध । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम्।
नि:स्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम्॥ २॥
अनुवाद
महाराज! जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मैंने देखा कि द्वारका निर्जन हो रही है। वहाँ न तो स्वाध्याय हो रहा है, न ही वषट्कार हो रहा है। वह आभूषणों से रहित सुन्दरी के समान उदास लग रही थी॥ 2॥
Maharaj! When I reached there, I saw that Dwarka was becoming destitute. Neither Swadhyaya (study) nor Vashtakkar (ritual practice) was taking place there. It looked sad like a beautiful woman devoid of ornaments.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥