श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.2.9 
द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च।
दु:खार्दितानिमान् क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वह द्रौपदी के अपमान और राज्यहरण के कारण पहले से ही दुःख भोग रहा है, अतः मैं उसे और कष्ट नहीं देना चाहता (उसे भोजन की व्यवस्था करने का आदेश देकर)।॥9॥
 
He is already suffering due to the insult of Draupadi and the abduction of the kingdom, so I do not want to put him to further trouble (by ordering him to arrange for food).॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)