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mahabharat 3.2.83: यज्ञ, युद्ध आदि से प्राप्त होने वाली सिद्धि पितृसिद्धि (परलोक और इहलोक में भी लाभदायक) है, जो तुमने पहले ही प्राप्त कर ली है। अब तुम तप के द्वारा उस योगसिद्धि को प्राप्त करने का प्रयत्न करो, जो ब्राह्मणों का भरण-पोषण कर सके। 83॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.2.83 
पितृमातृमयी सिद्धि: प्राप्ता कर्ममयी च ते।
तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
यज्ञ, युद्ध आदि से प्राप्त होने वाली सिद्धि पितृसिद्धि (परलोक और इहलोक में भी लाभदायक) है, जो तुमने पहले ही प्राप्त कर ली है। अब तुम तप के द्वारा उस योगसिद्धि को प्राप्त करने का प्रयत्न करो, जो ब्राह्मणों का भरण-पोषण कर सके। 83॥
 
The accomplishment achieved through yajna, war etc. is paternalistic (beneficial in the next world as well as in this world), which you have already achieved. Now try to attain that Yogasiddhi through penance which can support the Brahmins. 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)