Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.2.77: अन्तिम चार धर्मों को देवयानमार्ग का स्वरूप बताया गया है। मुनिगण सदैव उसी मार्ग का आश्रय लेते हैं। नीचे वर्णित आठ अंगों वाले मार्ग का अनुसरण करके अपने अन्तःकरण को शुद्ध करो और कर्तापन के अभिमान से रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। 77॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.2.77 
उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरित: सदा।
अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
अन्तिम चार धर्मों को देवयानमार्ग का स्वरूप बताया गया है। मुनिगण सदैव उसी मार्ग का आश्रय लेते हैं। नीचे वर्णित आठ अंगों वाले मार्ग का अनुसरण करके अपने अन्तःकरण को शुद्ध करो और कर्तापन के अभिमान से रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। 77॥
 
The last four religions have been described as the form of Devyanmarg. Sages always take refuge in the same path. Purify your conscience by following the path consisting of the eight parts described below and perform your duties without any pride of being a doer. 77॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)