श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  3.2.74 
तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।
तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान्नाभिमानात् समाचरेत्॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
वेद कर्म करने और कर्म त्यागने की आज्ञा देता है; अतः नीचे वर्णित समस्त धर्मों को अहंकाररहित होकर करना चाहिए ॥ 74॥
 
The Veda commands to perform action and to abandon action; therefore, all the Dharmas mentioned below should be performed without any ego. ॥ 74॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)