vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत
»
श्लोक 74
श्लोक
3.2.74
तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।
तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान्नाभिमानात् समाचरेत्॥ ७४॥
अनुवाद
वेद कर्म करने और कर्म त्यागने की आज्ञा देता है; अतः नीचे वर्णित समस्त धर्मों को अहंकाररहित होकर करना चाहिए ॥ 74॥
The Veda commands to perform action and to abandon action; therefore, all the Dharmas mentioned below should be performed without any ego. ॥ 74॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×