श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.2.72 
ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते।
जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमान: पुन: पुन:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
फिर वह मनुष्य ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियों में तथा जल, थल और आकाश में बार-बार जन्म लेता रहता है ॥72॥
 
Then, from Brahma to Trina, that man continues to take birth again and again among all the living beings and in water, land and sky. 72॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)