श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.2.7-8 
युधिष्ठिर उवाच
ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजा:।
सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम्॥ ७॥
आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमधूनि च।
त इमे शोकजैर्दु:खैर्भ्रातरो मे विमोहिता:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे ब्राह्मणों! ब्राह्मणों के प्रति मेरी भी बड़ी भक्ति है, किन्तु सब प्रकार के साधनों का अभाव मुझे दुःखी कर रहा है। मेरे ये भाई, जो फल, मूल और मधु आदि इकट्ठा करके ला सकते थे, स्वयं शोक के कारण शोक में डूबे जा रहे हैं।" 7-8
 
Yudhishthira said, "O Brahmins! I too have great devotion towards Brahmins, but the lack of all kinds of resources makes me sad. These brothers of mine, who could gather and bring fruits, roots and honey, are themselves getting engulfed in sorrow due to grief." 7-8
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)