श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.2.67 
षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा।
तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मन:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
जब मन और पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में लगे रहते हैं, तब प्राणियों के पूर्व निश्चय के अनुसार मन उन्हीं कामनाओं से व्याकुल हो उठता है ॥67॥
 
When the mind and the five senses are engaged in their respective objects, then according to the previous determination of the beings, the mind becomes agitated by the same desires. ॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)