श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.2.65 
शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञ: करोति विघसं बहु।
मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुग:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
अज्ञानी मनुष्य अपनी जननेन्द्रिय और उदर की तृप्ति के लिए आसक्ति और वासना के वशीभूत होकर नाना प्रकार के विषयों का सेवन करता है और उन्हें यज्ञ का अवशेष मानकर उनका संग्रह करता है ॥65॥
 
To satisfy his genitals and stomach, an ignorant man, under the influence of attachment and passion, pursues various types of subject matter and collects them considering them as the remains of Yagya. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)