Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.2.63: हे ब्रह्मन्! इस प्रकार रहने वाले गृहस्थ के लिए उत्तम धर्म की प्राप्ति बताई गई है। अथवा इस विषय में तुम्हारा क्या मत है? ॥63॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.2.63 
एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे।
तस्य धर्मं परं प्राहु: कथं वा विप्र मन्यसे॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार रहने वाले गृहस्थ के लिए उत्तम धर्म की प्राप्ति बताई गई है। अथवा इस विषय में तुम्हारा क्या मत है? ॥63॥
 
O Brahman! For a householder who lives in this way, it has been said that he will attain the best religion. Or what is your opinion on this matter? ॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)