श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  3.2.62 
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते।
श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत्॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
जो गृहस्थ किसी अनजान थके हुए यात्री को प्रसन्नतापूर्वक भोजन देता है, उसे महान पुण्य की प्राप्ति होती है ॥ 62॥
 
A householder who gladly gives food to an unknown, tired traveler, achieves great merit. ॥ 62॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)