श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.2.59 
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि।
वैश्वदेवं हि नामैतत् सायं प्रातश्च दीयते॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
कुत्ते, चाण्डाल और कौओं के लिए पृथ्वी पर अन्न डालो। यह वैश्वदेव नामक महान यज्ञ है, जो प्रातः और सायंकाल दोनों समय किया जाता है। ॥59॥
 
Throw food on the earth for the dogs, the chandalas and the crows. This is the great sacrifice called Vaishvadeva, which is performed in the morning as well as in the evening. ॥59॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)