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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत
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श्लोक 55
श्लोक
3.2.55
देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम्।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम्॥ ५५॥
अनुवाद
रोग आदि से पीड़ित मनुष्य को सोने के लिए शय्या, थके हुए को बैठने के लिए आसन, प्यासे को जल और भूखे को भोजन देना चाहिए ॥55॥
A person suffering from disease etc. should be given a bed to sleep, a seat to sit to the tired, water to the thirsty and food to the hungry. 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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