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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत
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श्लोक 52
श्लोक
3.2.52
कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् वर्तमानो गृहाश्रमे।
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्॥ ५२॥
अनुवाद
हे ब्राह्मण! यह कैसे उचित है कि मेरे समान गृहस्थ जीवन में रहने वाला मनुष्य अपने अनुयायियों का भी भरण-पोषण न करे?॥ 52॥
O Brahmin! How is it proper that a person like me, who lives in the household life, does not even support his followers?॥ 52॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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