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mahabharat 3.2.50: ‘युधिष्ठिर! इस प्रकार तुम्हें किसी वस्तु की इच्छा करना उचित नहीं है। यदि तुम्हारी रुचि केवल धर्म में है, तो धन की इच्छा को सर्वथा त्याग दो।’॥50॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.2.50 
युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि।
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थत:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
‘युधिष्ठिर! इस प्रकार तुम्हें किसी वस्तु की इच्छा करना उचित नहीं है। यदि तुम्हारी रुचि केवल धर्म में है, तो धन की इच्छा को सर्वथा त्याग दो।’॥50॥
 
‘Yudhishthira! Thus it is not proper for you to desire anything. If you are interested only in Dharma, then give up the desire for wealth completely.’॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)