श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.2.5 
ब्राह्मणा ऊचु:
गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यता:।
नार्हस्यस्मान् परित्यक्तुं भक्तान् सद्धर्मदर्शिन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों ने कहा - हे राजन! जो भी आपका भाग्य होगा, हम उसे भोगने को तैयार हैं। हम आपके भक्त हैं और उत्तम धर्म पर दृष्टि रखते हैं। अतः आप हमारा परित्याग न करें॥5॥
 
The Brahmins said - O King! We are also ready to suffer whatever fate befalls you. We are your devotees and have an eye on the best religion. Therefore, you should not abandon us. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)