श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.2.47 
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचय:।
ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डित:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
‘यौवन, सौन्दर्य, आयु, रत्नों का संग्रह, ऐश्वर्य और प्रियजनों का संग-ये सब अनित्य हैं; अतः विद्वान पुरुष को इनकी इच्छा नहीं करनी चाहिए ॥ 47॥
 
‘Youth, beauty, life, collection of gems, prosperity and the company of loved ones - all these are temporary; therefore a learned man should not desire them.॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)