श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.2.46 
अन्तो नास्ति पिपासाया: संतोष: परमं सुखम्।
तस्मात् संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिता:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
'धन की प्यास कभी नहीं बुझती; इसलिए संतोष ही परम सुख है। इसीलिए बुद्धिमान लोग संतोष को ही श्रेष्ठ मानते हैं॥ 46॥
 
‘The thirst for wealth is never quenched; hence contentment is the ultimate happiness. That is why wise people consider contentment to be the best.॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)