श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.2.45 
दु:खेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत्।
असंतोषपरा मूढा: संतोषं यान्ति पण्डिता:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
धन भी दुःख से ही प्राप्त होता है। अतः उसकी चिन्ता मत करो; क्योंकि धन की चिन्ता करना अपना ही नाश करना है। मूर्ख मनुष्य सदैव असंतुष्ट रहते हैं और विद्वान् पुरुष संतुष्ट रहते हैं॥ 45॥
 
‘Wealth is also attained through suffering. Therefore do not worry about it; because worrying about wealth is to destroy yourself. Foolish people are always dissatisfied and learned men are satisfied.॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)