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mahabharat 3.2.42-44: अतः धन प्राप्ति के सभी साधन मन में मोह को बढ़ाते हैं। विद्वानों ने कृपणता, अभिमान, अहंकार, भय और चिंता को मनुष्यों के लिए धन से होने वाले दुःख माना है। धन कमाने, उसे सुरक्षित रखने और खर्च करने में मनुष्यों को महान कष्ट होते हैं और वे धन के लिए एक-दूसरे की हत्या भी करते हैं। धन का त्याग करने में महान दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाए तो वह शत्रु के समान कार्य करता है।*॥42-44॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 42-44
 
 
श्लोक  3.2.42-44 
तस्मादर्थागमा: सर्वे मनोमोहविवर्धना:।
कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च॥ ४२॥
अर्थजानि विदु: प्राज्ञा: दु:खान्येतानि देहिनाम्।
अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये॥ ४३॥
सहन्ति च महद् दु:खं घ्नन्ति चैवार्थकारणात्।
अर्था दु:खं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रव:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
अतः धन प्राप्ति के सभी साधन मन में मोह को बढ़ाते हैं। विद्वानों ने कृपणता, अभिमान, अहंकार, भय और चिंता को मनुष्यों के लिए धन से होने वाले दुःख माना है। धन कमाने, उसे सुरक्षित रखने और खर्च करने में मनुष्यों को महान कष्ट होते हैं और वे धन के लिए एक-दूसरे की हत्या भी करते हैं। धन का त्याग करने में महान दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाए तो वह शत्रु के समान कार्य करता है।*॥42-44॥
 
‘Therefore all the means of acquiring wealth increase delusion in the mind. Scholars have considered miserliness, pride, arrogance, fear and anxiety as the sufferings caused by wealth for the mortals. Human beings suffer great suffering in earning, preserving and spending wealth and they kill each other for the sake of wealth. There is great suffering in renouncing wealth and if it is protected then it acts like an enemy*॥ 42-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)