श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.2.41 
अर्थ एव हि केषांचिदनर्थं भजते नृणाम्।
अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नर:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
'बहुत से लोगों के लिए धन ही अनर्थ का कारण बन जाता है; क्योंकि धन से प्राप्त होने वाले लाभ (सांसारिक सुखों) में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याण को प्राप्त नहीं होता॥ 41॥
 
'For many people money itself becomes the cause of disaster; because a person attached to the benefits (worldly pleasures) achieved through money does not achieve real welfare.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)