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mahabharat 3.2.39: 'धनवान लोग राजा, जल, अग्नि, चोर और अपने स्वजनों से उसी प्रकार सदैव भयभीत रहते हैं, जैसे सभी प्राणी मृत्यु से भयभीत रहते हैं ॥39॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.2.39 
राजत: सलिलादग्नेश्चोरत: स्वजनादपि।
भयमर्थवतां नित्यं मृत्यो: प्राणभृतामिव॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
'धनवान लोग राजा, जल, अग्नि, चोर और अपने स्वजनों से उसी प्रकार सदैव भयभीत रहते हैं, जैसे सभी प्राणी मृत्यु से भयभीत रहते हैं ॥39॥
 
'Rich people are always afraid of the king, water, fire, thieves and their own relatives, just like all living beings are of death. 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)