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mahabharat 3.2.32: अतः मित्र और धन पाकर उनमें आसक्ति न करो। ज्ञान के द्वारा शरीर से उत्पन्न होने वाली आसक्ति को दूर कर दो॥32॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.2.32 
तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात्।
स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अतः मित्र और धन पाकर उनमें आसक्ति न करो। ज्ञान के द्वारा शरीर से उत्पन्न होने वाली आसक्ति को दूर कर दो॥32॥
 
'Therefore, after getting friends and money, do not develop affection for them. Get rid of the attachments arising from your body through knowledge. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)