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mahabharat 3.2.31: जो विषयों के न मिलने पर भी उनका त्याग कर देता है, वह त्यागी नहीं है। परन्तु जो विषयों के दोष होने पर भी उन्हें त्याग देता है, वह त्यागी है - वही वैराग्य को प्राप्त होता है। क्योंकि उसका किसी से द्वेष नहीं है, इसलिए वह वैराग्यरहित है और बंधन से मुक्त है॥31॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.2.31 
विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे।
विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रह:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो विषयों के न मिलने पर भी उनका त्याग कर देता है, वह त्यागी नहीं है। परन्तु जो विषयों के दोष होने पर भी उन्हें त्याग देता है, वह त्यागी है - वही वैराग्य को प्राप्त होता है। क्योंकि उसका किसी से द्वेष नहीं है, इसलिए वह वैराग्यरहित है और बंधन से मुक्त है॥31॥
 
‘He who abandons objects when he cannot get them is not a renunciant. But he who abandons objects even after getting them because of their faults is a renunciant – he alone attains detachment. Since he has no animosity towards anyone, he is without enmity and is free from bondage.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)