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mahabharat 3.2.26: 'अतः जैसे अग्नि को जल से बुझाया जाता है, वैसे ही मानसिक दुःख को ज्ञान से बुझाना चाहिए। जब ​​मन का दुःख दूर हो जाता है, तो मनुष्य के शरीर का दुःख भी दूर हो जाता है। 26॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.2.26 
मानसं शमयेत् तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना।
प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'अतः जैसे अग्नि को जल से बुझाया जाता है, वैसे ही मानसिक दुःख को ज्ञान से बुझाना चाहिए। जब ​​मन का दुःख दूर हो जाता है, तो मनुष्य के शरीर का दुःख भी दूर हो जाता है। 26॥
 
'Therefore, like extinguishing fire with water, mental sorrow should be quenched through knowledge. When the sorrow of the mind goes away, the sorrow of the human body also goes away. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)