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mahabharat 3.2.24: 'इसलिए बुद्धिमान् और विद्वान् पुरुष पहले लोगों के मन के दुःखों को दूर करते हैं, प्रेमपूर्ण वचन बोलते हैं और उन्हें हितकारी सुख प्रदान करते हैं ॥24॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.2.24 
मतिमन्तो ह्यतो वैद्या: शमं प्रागेव कुर्वते।
मानसस्य प्रियाख्यानै: सम्भोगोपनयैर्नृणाम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'इसलिए बुद्धिमान् और विद्वान् पुरुष पहले लोगों के मन के दुःखों को दूर करते हैं, प्रेमपूर्ण वचन बोलते हैं और उन्हें हितकारी सुख प्रदान करते हैं ॥24॥
 
'Therefore, wise and learned men first relieve the mental sorrows of people by speaking loving words and providing them with beneficial pleasures. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)