श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.2.19 
अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च।
शारीरमानसैर्दु:खैर्न सीदन्ति भवद्विधा:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
‘आर्थिक संकट, घोर दुःख और स्वजनों पर आने वाली विपत्ति के समय, आप जैसे बुद्धिमान पुरुष शारीरिक और मानसिक कष्ट से पीड़ित नहीं होते।॥19॥
 
‘In times of financial crisis, severe suffering and calamity befalling relatives, wise people like you are not afflicted by physical and mental suffering.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)