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mahabharat 3.2.17: ‘तुम्हारे समान बुद्धिमान पुरुष अनेक दोषों से युक्त, ज्ञान के विपरीत और कल्याण का नाश करने वाले कर्मों में नहीं फँसता ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.2.17 
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु।
श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘तुम्हारे समान बुद्धिमान पुरुष अनेक दोषों से युक्त, ज्ञान के विपरीत और कल्याण का नाश करने वाले कर्मों में नहीं फँसता ॥17॥
 
‘A wise man like you does not get entangled in actions full of many faults, contrary to knowledge and destructive of welfare. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)