श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.2.16 
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
दुःख के हजारों स्थान हैं और भय के सैकड़ों स्थान हैं। मूर्ख मनुष्य को वे प्रतिदिन प्रभावित करते हैं; किन्तु बुद्धिमान मनुष्य को वे प्रभावित नहीं कर सकते॥16॥
 
‘There are thousands of places of sorrow and hundreds of places of fear. They affect the foolish man every day; but they cannot affect the wise man.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)