श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  3.2.14-15 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा स नृप: शोचन्निषसाद महीतले।
तमध्यात्मरतो विद्वान् शौनको नाम वै द्विज:॥ १४॥
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन ! ऐसा कहकर धर्मराज युधिष्ठिर शोक से व्याकुल होकर पृथ्वी पर चुपचाप बैठ गए। उस समय अध्यात्म में तत्पर रहने वाले अर्थात् ईश्वर के चिंतन में तत्पर, भक्ति, कर्मयोग और सांख्ययोग दोनों में पारंगत विद्वान ब्राह्मण शौनक ने राजा से इस प्रकार कहा - 14-15॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Saying this, Dharmaraja Yudhishthir sat silently on the earth in grief. At that time, the learned Brahmin Shaunaka, who was engaged in spiritual matters, i.e., engaged in contemplation of God, who was proficient in the idea of devotion, both Karma Yoga and Sankhya Yoga, said to the king thus - 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)