श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.2.13 
कथं द्रक्ष्यामि व: सर्वान् स्वयमाहृतभोजनान्।
मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान् धिक् पापान् धृतराष्ट्रजान्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम सबको अपने लिए भोजन की व्यवस्था करते और खाते हुए कैसे देख सकता हूँ? तुम कष्ट सहने के योग्य नहीं हो, फिर भी मुझ पर स्नेह के कारण इतना कष्ट सह रहे हो। धृतराष्ट्र के पापी पुत्रों को धिक्कार है॥13॥
 
How can I see all of you arranging food for yourself and eating? You are not worthy of suffering, yet you are enduring so much suffering because of your affection for me. Shame on the sinful sons of Dhritarashtra.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)