श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.2.10 
ब्राह्मणा ऊचु:
अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत् ते हृदि पार्थिव।
स्वयमाहृत्य चान्नानि त्वानुयास्यामहे वयम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने कहा - पृथ्वीनाथ ! आप हमारे भरण-पोषण की चिंता न करें। हम अपने भोजन आदि का प्रबंध स्वयं कर लेंगे और आपके साथ चलेंगे॥ 10॥
 
The Brahmin said - Prithvinath! You should not be worried about our maintenance. We will arrange for our food etc. ourselves and will come with you.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)