| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 199: राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 3.199.13  | भवन्ति चात्र श्लोका:—
दिवं स्पृशति भूमिं च शब्द: पुण्यस्य कर्मण:।
यावत् स शब्दो भवति तावत् पुरुष उच्यते॥ १३॥ | | | | | | अनुवाद | | इस सम्बन्ध में ये श्लोक हैं - 'जब तक मनुष्य के पुण्यकर्मों का शब्द पृथ्वी तथा देवलोक को स्पर्श करता है, जब तक दोनों लोकों में उसकी कीर्ति रहती है, तभी तक वह मनुष्य स्वर्ग का वासी कहा गया है ॥13॥ | | | | There are these verses in this regard - 'As long as the word of a man's virtuous deeds touches the earth and the world of gods, as long as his fame remains in both the worlds, only then is that man said to be a resident of heaven. 13॥ | | ✨ ai-generated | | |
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