श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 198: देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  3.198.6-7 
प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषि:। तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत्॥ ६॥
अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान्निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता-मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
ऋषि ने उत्तर दिया, 'प्रतर्दन को।' 'इसका क्या कारण है?' यह प्रश्न पूछे जाने पर ऋषि बोले, 'एक दिन मैं भी प्रतर्दन के घर ठहरा था। वह मुझे रथ पर ले जा रहा था। उस समय एक ब्राह्मण आया और उससे विनती करने लगा, 'कृपया मुझे एक घोड़ा दीजिए।' तब उसने ब्राह्मण से कहा, 'मैं लौटते समय तुम्हें दे दूंगा।' ब्राह्मण ने कहा, 'नहीं, मुझे तुरंत दे दो।' 'अच्छा, इसे तुरंत ले लो।' यह कहकर उन्होंने रथ के दाहिनी ओर से घोड़ा खोलकर उसे दे दिया।
 
‘The sage replied, ‘To Pratrdan.’ ‘What is the reason for this?’ On being asked this question, the sage replied, ‘One day I also stayed at Pratrdan’s house. He was taking me in a chariot. At that time a Brahmin came and requested him, ‘Please give me a horse.’ Then he replied to the Brahmin, ‘I will give it to you on my return.’ The Brahmin said, ‘No, give it to me immediately.’ ‘Well, take it immediately.’ Saying this, he untied the horse from the right side of the chariot and gave it to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)