श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 198: देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.198.27 
सद्भि: सदाध्यासितं तु प्रशस्तं
तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे।
एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु
तस्मादहं वेद यथावदेतत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इसीलिए मेरी बुद्धि सदैव उसी सर्वश्रेष्ठ मार्ग का आश्रय लेती है। यह राजा शिबि का सर्वश्रेष्ठ माहात्म्य है, जिसे मैं (अच्छी तरह) जानता हूँ। इसीलिए मैंने इन सब बातों का यथावत् वर्णन किया है॥27॥
 
The path followed by the great men is the best path. That is why my intellect always takes refuge in that best path. This is the best glory of King Sibi, which I know (well). That is why I have described all these things as they are.॥27॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि राजन्यमहाभाग्ये शिबिचरिते अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें क्षत्रियमाहात्म्यके प्रकरणमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)